Tuesday, March 17, 2009

एक ज़रूरी काम

मंदी के दौर में अगर वाक़ई कुछ ज़्यादा है, तो वो है काम। कमबख़्त इतना काम है कि इस काम के चक्कर में सारे काम ठप्प पड़े हैं। ब्लॉग को ही लीजिए। कितना ज़रूरी काम है ब्लॉग लिखना। मगर रोज़-रोज़ कहां लिख पाते हैं ? बहरहाल, आज अशोक चक्रधर जी की सभा में ब्लॉग पाठ है सो ये नई पोस्ट डालना एक ज़रूरी काम की तरह किया जा रहा है। वैसे अपने हालात फ़ैज़ साहब पहले ही बयां कर गए थे। आप भी समात फ़र्माएं-

वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया
कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

यहां अधूरा छोड़ने की नौबत भर नहीं आई है। आसार पूरे हैं। दुआ कीजिए ऐसे आसार और सिर न उठाएं। आमीन।

4 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

ब्‍लॉग की आग

लगी हुई है कम

कम ही सही पर

है तो सही दम।

अविनाश वाचस्पति said...

उपर की टिप्‍पणी का
शुद्ध संस्‍करण नीचे है
:-

ब्‍लॉग की आग
लगी हुई है कम
कम ही सही पर
है तो खूब दम।

sangita puri said...

हौसले बुलंद हों तो न तो काम और न ही ब्‍लाग को अधूरा छोडने की नौबत आएगी ... हमारी शुभकामनाएं आपके साथ रहेगी।

गौतम राजऋषि said...

ये सही कहा है आपने आलोक जी....लेकिन जब कभी समय मिले बस आ जाया कीजिये अपने ब्लौग पर। हम याचक हैं आपके शब्दों के....