Saturday, February 13, 2010

'जग जीत' ने का हुनर

बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है।

बात, 1 दिसंबर 2009 की है। जगजीत जी यूएस में थे, वहीं से फ़ुनियाया - 'आलोक, कश्मीर पर नज़्म लिखो। 9 दिसंबर को वहां शो है, गानी है।' मैंने कहा - 'मगर में तो कभी कश्मीर गया नहीं। हां, वहां के हालाते-हाज़िर ज़रूर ज़हन में हैं, उन पर कुछ लिखूं.?' 'नहीं कश्मीर की ख़ूबसूरती और वहां की ख़ुसूसियात पर लिखो, जिनकी वजह से कश्मीर धरती की जन्नत कहा जाता है। 4 दिसंबर को इंडिया आ रहा हूं तब तक लिख कर रखना। सुनूंगा।' हुक्म जगजीत जी का था, तो ख़ुशी के मारे पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। मगर कांप भी रहे थे कि इस भरोसे पर खरा उतर भी पाऊंगा, या नहीं.? बहरहाल।

4 तारीख़ को दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का मुशायरा था। मलिक ज़ादा साहब, वसीम बरेलवी साहब और जनाब मुनव्वर राना से मुशायरे का डाइज़ सजा हुआ था। रात के कोई ग्यारह बजे होंगे। इक़बाल इशहर अपने अशआर पेश कर रहे थे और मैं दावते-सुख़न के इंतज़ार में था कि तभी मोबाइल घनघनाया। वादे के मुताबिक़ जगजीत जी लाइन पर थे और मैं उस नज़्म की लाइनें याद करने लगा जो सुबह ही कहीं थीं। 'हां, सुनाओ, कहा कुछ.?' 'जी, मुखड़े की शक्ल में दो-चार मिसरे कहे हैं।' 'बस, दो-चार ही कह पाए... चलो सुनाओ।' मैंने डरते हुए अर्ज़ किया -

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झिलों के ज़ेवर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र


'हां अच्छा है, इसे आगे बढ़ाओ।' जो जगजीत जी को क़रीब से जानते है, वो ये मानते होंगे कि उनका इतना कह देना ही लाखों दानिशमंदों की दाद के बराबर होता है। 'जी, 6 दिसंबर को संडे है, उसी दिन पूरी करके शाम तक नोट करा दूंगा।' उनके ज़हन में जैसे कोई क्लॉक चलता है, सोचा और बोले - 'अरे 9 तारीख़ को तो गानी है, कम्पोज़ कब करूंगा। और जल्दी कहो।' मगर मैंने थोड़ा एस्कूज़ किया तो मान गए। 6 दिसंबर को शाम फ़ोन लगाया तो कार से किसी सफ़र में थे 'क्या हो गई नज़्म, नोट कराओ।' मैंने पढ़ना शुरू किया -

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झिलों के ज़ेवर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र


यहां के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत
यहां की ज़बां है बड़ी ख़ूबसूरत
यहां की फ़िज़ा में घुली है मुहब्बत
यहां की हवाएं भी ख़ुशबू से हैं तर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र


ये झीलों के सीनों से लिपटे शिकारे
ये वादी में हंसते हुए फूल सारे
यक़ीनों से आगे हसीं ये नज़ारे
फ़रिश्ते उतर आए जैसे ज़मीं पर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र


सुख़न सूफ़ियाना, हुनर का ख़ज़ाना
अज़ानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों फ़कीरों का है आशियाना
यहां सर झुकाती है क़ुदरत भी आकर

ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

'अच्छी है, मगर क्या बस इतनी ही है.?' मैंने कहा - 'जी, फ़िलहाल तो इतने ही मिसरे हुए हैं।' 'चलो ठीक है। मिलते हैं।'

9 दिसंबर, शाम 4 बजे ग़ज़ल के परस्तारों से खचाखच भरा श्रीनगर का एसकेआईसीसी ऑडिटोरियम ग़ज़ल गायिकी के सरताज जगजीत सिंह का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। कहीं सीटियां गूंज रहीं थीं तो कहीं कानों को मीठा लगने वाला शोर हिलोरे ले रहा था और ऑडिटोरियम की पहली सफ़ में बैठा मैं, जगजीत जी की फ़ैन फ़ॉलॉइंग के इस ख़ूबसूरत नज़ारे का गवाह बन रहा था।

जगजीत जी स्टेज पर आए और ऑडिटोरियम तालियों और सीटियों की गूंज से भर गया और जब गुनगुनाना शुरू किया तो माहौल जैसे बेक़ाबू हो गया। एक के बाद एक क़िलों को फ़तह करता उनका फ़नकार हर उस दिल तक रसाई कर रहा था जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ून ही गर्दिश कर सकता है। उनकी आवाज़ लहू बन कर नसों में दौड़ने लगी थी। जग को जीतने वाला जगजीत का ये अंदाज़ मैने पहले भी कई बार देखा था लेकिन आज माहौल कुछ और ही था। आज जगजीत किसी दूसरे ही जग में थे। ये मंज़र तो बस वहां तक का है जहां तक उन्होंने इस ख़ाकसार की लिखी नज़्म कश्मीर पेश नहीं की थी। दिलों के जज़्बात और पहाड़ों की तहज़ीब बयां करती जो नज़्म उन्होंने लिखवा ली थी उसका मंज़र तो उनकी आवाज़ में बयां होना अभी बाक़ी था।

मगर जुनूं को थकान कहां होती.? अपनी मशहूर नज़्म वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी के पीछे जैसे ही उन्होंने पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर बिछाई पूरा मंज़र ही बदल गया। हर मिसरे पर वंसमोर की आवाज़ ने जगजीत जी को बमुश्किल तमाम आगे बढ़ने दिया। आलम ये रहा कि कुल जमा सोलह मिसरों की ये नज़्म वो दस-पंद्रह मिनिट में पूरी कर पाए।

दूसरे दिन 10 दिसंबर 2009 की सुबह श्रीनगर के सारे अख़बार जगजीत के जगाए जादू से भरे पड़े थे। अमर उजाला में ये कश्मीर क्या है, है जन्नत का मंज़र की हेड लाइन थी और ख़बर में लिखा था - ''पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर / चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर / हसीं वादियों में महकती है केसर / कहीं झिलमिलाते हैं झिलों के ज़ेवर / ये कश्मीर क्या है, है जन्नत का मंज़र आलोक श्रीवास्तव के इन बोलों को जब जगजीत सिंह का गला मिला तो एसकेआईसीसी का तापमान यकायक गरम हो गया। ये नज़्म की गर्मी थी और सुरों की तुर्शी। ऑडिटोरियम के बाहर का पारा माइनस में ज़रूर था मगर अंदर इतनी तालियां बजीं कि हाथ सुर्ख़ हो गए। स्टीरियो में कान लगाकर सुनने वाले घाटी के लोग और जगजीत सिंह बुधवार को यूं आमने-सामने हुए।''

बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है। और अब ये वीडियो भी देख ही डालिए - http://www।youtube.com/watch?v=hwegpUJx774

30 comments:

नितिन | Nitin Vyas said...

बहुत खूब! इस का विडियो भी उपलब्ध करा दें तो बहुत मेहरबानी होगी।

निर्मला कपिला said...

बहुत बडिया वेडिओ तो जरूर देखना चाहेंगे सभी आपको बहुत बहुत बधाई

हिमांशु । Himanshu said...

जगजीत जी की मखमली आवाज संवेदनाओं को सहलाती रही है । बहुत-सी संवेदनाओं,भावनाओं को समझाया है जगजीत जी की गज़लों ने ।
आपकी लिखी और उनकी आवाज में गायी यह नज़्म सुनने की आकांक्षा है । प्लेयर जरूर लगायें ।

आभार ।

"अर्श" said...

आलोक जी नमस्कार,
बात पुरानी हो मगर तारीख बन जाए तो फिर धुंधली कहाँ होती है ... सच ही तो कहा है आपने ... क्या सुखद अनुभूति हुई होगी आपको , थोडा बहुत इस बात से भी महसूस कर सकता हूँ क्युनके मेरे लिए भी वही बात है जब आपने मुझे इस पोस्ट को पढने के लिए निमत्र
क्या खूब बात कही है आपने इस रचना के जरिये ... बगैर किसी चीज को देखे उसके बारे में लिखना बहुत ही कठिन कार्य है , आप जब इस चुनौती में खरे उतारते हैं तो फिर इसमें ख़ुशी का अंदाज़ा लगा पाना कठिन होता है ...
बगैर देखे कश्मीर के बारे में ऐसे खुबसूरत एहसासात कहने क्या खूब बात है
पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर...
............
पूरी रचना को जगजीत सिंह साहब की आवाज़ में सुनने की खाहिश हो चुकी है कब पूरी होगी आपसे ही पूछता हूँ ...

और हाँ आमीन अब मेरे पास है ... डूबा हुआ हूँ उसमे .... :)

आपका
अर्श

Agyaatshatru said...

बात अगर तारीख बन जाए तो धुंधली कहां होती है, शुक्र है इस ख्याल का जो आपके ज़हन में आया। कम से कम आपने हमें पूरी नज्म तो पढ़वा दी। वरना हम तो उस दिन से अब तक सिर्फ शुरूआती दो-चार मिसरों से ही धरती के जन्नत की सैर कर रहे थे। और जगजीत जी का भी शुक्रिया, जो उन्होंने आपसे इतनी फुर्ती में यह खूबसूरत नज्म लिखवा ली, वरना आप के जहन में पढ़े मिसरों को नज्म में आने के लिए पता नहीं कब तक इंतजार करना पड़ता।

pukhraaj said...

उनकी आवाज़ के दीवानों की दीवानगी का आलम न पूछो , गहराती आवाज़ रगों में कहीं गहरे उतर जाती है ... फिर उस पर मिसरे अपने लिखे हो तो कैसे न बेहोशी का आलम बने ...
आलोक जी ये भी बताये की किस एल्बम में ये ग़ज़ल सुनने को मिल सकती है ...वल्लाह जन्नत तो फिर जन्नत है

पीयूष पाण्डे said...

अब जगजीत सिंह ने गायी नज़्म तो उम्दां ही गायी होगी-शक नहीं। लेकिन, हम तो आपकी शायरी के कायल हैं। बहुत खूब आलोक भाई। जमे रहो....

venus kesari said...

आपकी बात ही दोहराना चाहता हूँ

बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है

बहुत खूब :)

vikas zutshi said...

bhut dino baad aana hua apke blog par,
kashmeer par acha likha tha aapne, aur wo bhi tab jab (humari tarah )wahan kabhi jana nhi hua.

श्रद्धा जैन said...

सुख़न सूफ़ियाना, हुनर का ख़ज़ाना
अज़ानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों फ़कीरों का है आशियाना
यहां सर झुकाती है क़ुदरत भी आकर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

aha kya nazm kahi hai....... khoobsurat har lafz khoobsurat

ise sunna bhi chahungi agar suna sakte ho to zarur link den


badhayi ........

गौतम राजरिशी said...

उस दिन पूरा मंसूबा बना हुआ था महफ़िल में शिरकत करने का। श्रीनगर से थोडी ही दूरी पर तो हूँ मैं....कुछ टपक पड़ा बीच में ही प्रोफेशन से जुडा हुआ तो मन-मसोस कर रह जाना पड़ा। ये जो पता होता कि आप भी हो तो कुछ और जोर लगा लेता आने के लिए।

नज़्म तो आलोक साब के कलम से निकली है तो बेहतरीन होनी ही है...कश्मीर के चप्पे-चप्पे से वाकीफ़ हो गया हूं अब तो कह सकता हूं कि लाजवाब नज़्म बुनी है आपने। बाकी जगजीत तो सचमुच जग को जीतने का हुनर जानते हैं।

Rahul Ranjan said...
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Rahul Ranjan said...

"aaj fir aap ke jag jeet lene ke hunar ko mahsus kia - hamne"

kya kahe - shabd nahi hain...

shubh-mangal-kamnae...

Dileepraaj Nagpal said...

पहली बार आपकी गजल 'बाबू जीं' पढ़ी थी। आज पहली बार आपके ब्लॉग पर विजिट की तो जगजीत सिंह की तस्वीर देख मन खुश हो गया। उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं, इसलिए भी और उनकी जन्मभूमि श्रीगंगानगर में ही मेरी जड़ें बसी हैं, इस कारण भी। कश्मीर की गजल पसन्द आई। इस 'गन्दे बच्चें' की बधाई स्वीकारें।
शुक्रिया

शहरोज़ said...

सुख़न सूफ़ियाना, हुनर का ख़ज़ाना
अज़ानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों फ़कीरों का है आशियाना
यहां सर झुकाती है क़ुदरत भी आकर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

jiyo mere laal!! bhai maza aa gaya!!

DUSHYANT said...

bhai ko mubaaraq!

सुभाष नीरव said...

Mubarq ho Aalok ji, bahut sunder likha hai aapne. Nischit hi awaz ka zadu bikherane wale Jagjit ne apne swar se ise aur bhi khubsoorat bana diya hoga. aapko badhayee !

Amit said...

aapko bahut bahut badhai, Jagjitji ke suro mein aapki likhi gajal wah, Sunne mein bada ras ayegaa, asha karta hoon ye saubhagya hame zaroor milega, Kashmir pe likha aapka lar lafz bemisaal hai, aapko dher saari badhaiyan phir se ek baar

amit

Sharbani said...

bahut khoob aalok ji.... aapki shayari aur gazlon k to pehle bhi kaayal the.... lekin iss nazm ne to dil jeet liya.... Bahut Bahut badhai....

Udan Tashtari said...

जगजीत जी की आवाज और आपकी नज़्म, वाह!!

काश!! किसी तरह सुन पाते. हाल फिलहाल तो अहसास रहे हैं. अति सुन्दर आलोक भाई!

गिरिजेश.. said...
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गिरिजेश.. said...

'गर फ़िर्दौस बर रुए ज़मीन अस्त..' का अद्भुत पाठ है ये । हर मिसरा ताज़गी और मिठास में डूबा हुआ.. सचमुच अच्छी नज़्म हुई है। दुआ है कि ये नज़्म भी तारीख़ बने, कश्मीर की शान में कही गई ख़ूबसूरत नज़्मों में गिनी जाए।
इस मिठास को जगजीत सिंह ने अपने सुरों का जामा पहनाया होगा तो बेशक दोहरे नशे जैसी तासीर पैदा हुई होगी। सुनने का बहुत मन है। कुछ कीजिए।
('बाबूजी' के कुछ मिसरे हैं- जितनी बार पढ़ो, आंख भर आती है- 'मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी..' जीते रहिए!!)

girjesh choudhary said...

thanks for sweets

Namaskar Bhaisahab,

Ek roj aapki kavita " Babu ji..." ko pada aur usi din na jaane kya hua
mujhe tatkal mumbai se ganj basoda ki ticket book karanee padi, Papa
ji se milne ke liye. Aur aaj fir aapki kavita mein kasmeer ko dekhkar
vaisi hi anubhuti aur ekchha ho rahi hai ki aaj hi kasmeer ka ticket
book kara loo. Aap bahut visualy likhte hai aapse har bar naya seekhta
hoo.

nayee anubhuti pradan karne ke liye bahut-bahut dhanyabad.

Aapka hi - girjesh choudhary

Manish Kumar said...

बेहतरीन नज़्म लिखी आपने। बस सोच रहा हूँ कब इसे जगजीत जी की आवाज़ में सुनने का मौका लगेगा।

नीरज गोस्वामी said...

आपकी नज़्म और उसे मिली जगजीत साहब की मखमली आवाज़ से जागे जादू को महसूस किया जा सकता है...कश्मीर को आपने लफ़्ज़ों का खूबसूरत जामा पहना दिया है...जब दो हुनर मंद एक साथ जुड़ेंगें तो ये हंगामा तो होना लाज़मी ही है...बहुत शुक्रिया इस खूबसूरत नज़्म को हम सब में बांटने के लिए.
नीरज

शुभ्रा said...

मैं जानती हूं आप अनजाने में ही मेल मुझे कॉपी कर देते हैं ..लेकिन अच्छा लगता है आपकी नज्में पढकर.... ये जानकर और भी अच्छा लगता है कि जगजीत सिंह जी ने इन्हें अपनी आवाज़ दी है ...

prabhat said...

आदरणीय महोदय,

प्रमोद वर्मा जैसे हिन्दी के प्रखर आलोचक की दृष्टि पर विश्वास रखनेवाले, मानवीय और बौद्धिक संवेदना के साथ मनुष्यता के उत्थान के लिए क्रियाशील छत्तीसगढ़ राज्य के साहित्य और संस्कृतिकर्मियों की ग़ैरराजनीतिक संस्था ‘प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान’ द्वारा जनवरी, 2010 से प्रकाश्य त्रैमासिक पत्रिका ‘पांडुलिपि’ हेतु आप जैसे विद्वान, चर्चित रचनाकार से रचनात्मक सहयोग का निवेदन करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है । हमें यह भी प्रसन्नता है कि ‘पांडुलिपि’ का संपादन ‘साक्षात्कार’ जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका के पूर्व संपादक, हिंदी के सुपरिचित कवि, कथाकार एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी करेंगे ।
हम ‘पांडुलिपि’ को विशुद्धतः साहित्य, कला, संस्कृति, भाषा एवं विचार की पत्रिका के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं । आपसे बस यही निवेदन है कि ‘पांडुलिपि’ को प्रेषित रचनाओं के किसी विचारधारा या वाद की अनुगामिता पर कोई परहेज़ नहीं किन्तु उसकी अंतिम कसौटी साहित्यिकता ही होगी । ‘पांडुलिपि’ में साहित्य की सभी विधाओं के साथ साहित्येतर विमर्शों (समाज /दर्शन/चिंतन/इतिहास/प्रौद्योगिकी/ सिनेमा/चित्रकला/अर्थतंत्र आदि) को भी पर्याप्त स्थान मिलेगा है, जो मनुष्य, समाज, देश सहित समूची दुनिया की संवेदनात्मक समृद्धि के लिए आवश्यक है । भारतीय और भारतीयेतर भाषाओं में रचित साहित्य के अनुवाद का यहाँ स्वागत होगा । नये रचनाकारों की दृष्टि और सृष्टि के लिए ‘पांडुलिपि’ सदैव अग्रसर बनी रहेगी।
किसी संस्थान की पत्रिका होने के बावजूद भी ‘पांडुलिपि’ एक अव्यवसायिक लघुपत्रिका है, फिर भी हमारा प्रयास होगा कि प्रत्येक अंक बृहताकार पाठकों पहुँचे और इसके लिए आपका निरंतर रचनात्मक सहयोग एवं परामर्श वांछित है ।
प्रवेशांक ( जनवरी-मार्च, 2010 ) हेतु आप अपनी महत्वपूर्ण व अप्रकाशित कथा, कविता ( सभी छांदस विधाओं सहित ), कहानी, उपन्यास अंश, आलोचनात्मक आलेख, संस्मरण, लघुकथा, निबंध, ललित निबंध, रिपोतार्ज, रेखाचित्र, साक्षात्कार, आत्मकथा, समीक्षा, अन्य विमर्शात्मक सामग्री आदि हमें 28 फरवरी, 2010 के पूर्व भेज सकते हैं । कृति-समीक्षा हेतु कृति की 2 प्रतियाँ अवश्य भेजें ।
यदि आप किसी विषय-विशेष पर लिखना चाहते हैं तो आप श्री प्रभात त्रिपाठी से ( मोबाइल – 094241-83427 ) चर्चा कर सकते हैं । आप फिलहाल समय की कमी से जूझ रहे हैं तो बाद में भी आगामी किसी अंक के लिए अपनी रचना भेज सकते हैं ।
हमें विश्वास है – रचनात्मक कार्य को आपका सहयोग मिलेगा ।
01 - pandulipipatrika@gmail.com
02. जयप्रकाश मानस, कार्यकारी संपादक, एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, छत्तीसगढ़ – 492001 मोबाइल - 94241-82664

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प्रबल प्रताप सिंह् said...

यहां के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत
यहां की ज़बां है बड़ी ख़ूबसूरत
यहां की फ़िज़ा में घुली है मुहब्बत
यहां की हवाएं भी ख़ुशबू से हैं तर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र
bahut khoobsurat lines...!!

प्रदीप जिलवाने said...

बहुत खूबसूरत पंक्तियां हैं....

प्रदीप जिलवाने, खरगोन

स्वाति said...

बात पुरानी हो मगर तारीख बन जाए तो फिर धुंधली कहाँ होती है ... सच कहा है आपने ..
बहुत खूब!